Monday, July 17, 2023

दुनिया का औसत तापमान और उसमें मामूली वृद्धि


चित्र साभार: https://wicnews.com

एक हफ्ते से ऊपर हो गया दुनिया के औसत तापमान को लेकर मेरी एक पोस्ट के बारे में जिक्र करते हुए एक मित्र ने बातचीत में मुझसे पूछा कि मौसमविज्ञानी सारी दुनिया का औसत तापमान कैसे नाप लेते हैं और फिर एक दिन में अगर दुनिया का औसत तापमान 0.17° या 0.05° सेल्सियस बढ़ भी जाता है तो कौन-सी आफत आ जाती है. दोनों सवाल एकदम उपयुक्त थे और किसी भी व्यक्ति के लिए इनके बारे में जानना स्वाभाविक है. 

पहला सवाल: दुनिया का औसत तापमान कैसे नापते हैं?

दरअसल, हम जिसे औसत तापमान कहते हैं, भू-विज्ञान की दृष्टि से वह दुनिया में धरातल का औसत तापमान है. इसकी गणना समुद्र की सतह पर तापमान और धरती पर हवा के तापमान का औसत लगाकर की जाती है. धरती के तापमान की पूरी तस्वीर पाने के लिए वैज्ञानिक धरती के ऊपर की हवा और जहाजों, समुद्री यंत्रों और कभी-कभी उपग्रहों से एकत्र किए गए समुद्री सतह के तापमान को जोड़ते हैं.

धरती और महासागर के हर स्टेशन पर तापमान की तुलना रोजाना उस जगह में और उस समय पर रहने वाले 'सामान्य' तापमान से की जाती है और अमूमन 30 साल की अवधि का उनका दीर्घकालिक औसत निकाला जाता है. उसमें अगर अंतर आए तो वैज्ञानिक अंदाजा लगाते हैं कि तापमान समय के साथ किस तरह बदल रहा है या बदल गया है. 

अगर अंतर बढ़ जाए तो उसका मतलब है तापमान दीर्घकालिक औसत से ज्यादा गरम है. अगर अंतर कम हो जाए तो उसका मतलब तापमान औसत से ठंडा है. रोजाना जो अंतर आता है, उसे जोड़कर पूरे महीने का औसत निकाला जाता है और फिर उनका इस्तेमाल मौसम-दर-मौसम और साल-दर-साल तापमान संबंधी अंतर निकालने के लिए किया जाता है.

दूसरा सवाल: औसत तापमान में मामूली वृद्धि से क्या आफत आएगी?  

इसमें सबसे पहले जरूरी है कि औसत तापमान को किसी जगह का सामान्य तापमान समझने की गलती न करें. किसी जगह के सामान्य तापमान में एक दिन में ही खासा अंतर आ सकता है. लेकिन औसत तापमान में मामूली वृद्धि ही जलवायु में बहुत बड़े बदलाव का कारण बन जाती है. 

हम 1880 के दशक से, जबसे मनुष्य ने तापमान का रिकॉर्ड रखना शुरू किया, हर दशक में औसत तापमान में आए बदलाव पर नजर डालें. तब दुनिया का औसत तापमान 13.73° सेल्सियस था. उसमें 1890 वाले दशक तक पहुंचते-पहुंचते 0.02° से. की बढ़ोतरी हो गई. 1970 का दशक आते-आते यानी 90 साल के दौरान यह बढ़ोतरी 0.27° से. तक जा पहुंची थी. 2010 वाले दशक के अंत तक यह वृद्धि 0.97° से. हो चुकी थी और औसत तापमान 14.70° से. था. 

दुनिया तब सावधानी की मुद्रा में तो थी ही, लेकिन उसके बाद जलवायु में बदलाव को उसने संकट के रूप में लेना शुरू किया. रिकॉर्ड में 2010 का दशक अभी तक का सबसे गरम दशक रहा है. 2015 से लेकर 2022 तक के आठ साल में तो गरमी शिखर पर पहुंच चुकी है. 

एक सदी में तापमान मात्र कोई 1° से. बढ़ने से ही नतीजा यह हुआ कि क्षेत्रवार और मौसमवार तापमान हदें पार करने लगा है, समुद्र ज्यादा गरम होने से उनकी सतह ऊंची उठ गई है और तटवर्ती इलाके पानी में डूब गए है, प्रचंड तूफानों की संख्या बढ़ गई है, कहीं सूखा पड़ने की गति में तेजी आई है तो कहीं भारी बारिशें होने लगी है, पौधों और जानवरों के रिहायशी इलाके कहीं सिकुड़ने तो कहीं बढ़ जाने, और दुनिया भर में इंसानों की बस्तियां तबाह होने से उनकी जातियों-प्रजातियों की संख्या घट गई है, वगैरह-वगैरह. 

संयुक्त राष्ट्र द्वारा मौसम परिवर्तन को लेकर गठित दल, आइपीसीसी के मुताबिक़, अगर दुनिया में तापमान में बढ़ोतरी होती गई तो नीचे दिए परिणाम हो सकते हैं:

समुंदर के पानी की बढ़ती सतह के चलते कोई 25-30 साल बाद एशिया-प्रशांत क्षेत्र में लगभग 1 अरब लोग प्रभावित होंगे; मुंबई, ढाका, बैंकाक, हो ची-मिन्ह सिटी, जकार्ता और शंघाई जैसे शहरों के डूबने का खतरा है; ब्रिटेन और यूरोप अत्यधिक बारिश की वजह से भयानक बाढ़ की चपेट में आ जाएंगे; मध्य-पूर्व के देश अत्यधिक गर्मी की लहरों और व्यापक सूखे का अनुभव करेंगे; प्रशांत क्षेत्र के द्वीप देश समुद्र में डूब सकते हैं; कई अफ़्रीकी देशों को सूखे और भोजन की कमी का सामना करना पड़ सकता है; पश्चिमी अमेरिका में सूखे की स्थिति होने की संभावना है, जबकि अन्य इलाकों में ज़्यादा तीव्र तूफ़ान देखने को मिलेंगे; ऑस्ट्रेलिया में अत्यधिक गर्मी और जंगल की आग से मौतें होने की संभावना होंगी.

ऐसे में जाहिर है कि औसत तापमान में मामूली वृद्धि भी होने से बरसों बाद उसका नतीजा आफत आने में ही निकलता है. 

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