विश्व शक्ति संतुलन: बहुध्रुवीय व्यवस्था में दो बड़े खेमे (किस्त 1)
मौजूदा दुनिया में आज हर कहीं कॉर्पोरेट पूंजीवादी व्यवस्था
का बोलबाला है. इसमें दौलत पैदा करने की उसकी सारी प्रक्रियाएं किसी एक राष्ट्र, एक देश तक सीमित नहीं रह गई हैं. इन कॉर्पोरेट प्रक्रियाओं में व्यापार की
गतिविधियां, कारखानों या उत्पादन के प्रतिष्ठानों में पूंजी का निवेश, बैंक व्यवसाय, बिक्री के लिए बाजार, एक जगह से दूसरी जगह
टेक्नोलॉजी लाना-ले जाना, या इसी तरह के कई दूसरे कारोबार शामिल हैं. इन सभी
प्रक्रियाओं का जाल सर्वत्र फैला होने से उनका चरित्र भी अंतरराष्ट्रीय या
अंतरदेशीय हो गया है और लगातार होता जा रहा है.
इसके चलते दुनिया में लोगों के अलग-अलग समूहों, समुदायों अथवा राष्ट्रीयताओं के बीच आपसी मेलजोल और एक-दूसरे से विचार-विमर्श
इस कदर तेजी से बढ़े हैं जिससे वैश्वीकरण का एक विशाल सिलसिला खड़ा हो गया है. इसकी
वजह से देश अंतरनिर्भर हो गए हैं और यह अंतरनिर्भरता बढ़ती ही जा रही है. इसका
नतीजा यह हुआ है कि दुनिया अंतरनिर्भर इकाइयों के एक ढीले-ढाले सामाजिक ढांचे में
पिरोई जा चुकी है, यानी वह मानसिक रूप से और भौतिक रूप से भी एक
इकाई बन गई है.
कॉर्पोरेट पूंजीवादी व्यवस्था के नेताओं ने दुनिया में यह
नया सिलसिला पैदा होते ही उसे फौरन लपक लिया. इनमें पहले तो अमूमन विकसित देशों के
और खासकर अमेरिका के कॉर्पोरेट और राजनैतिक शासक हलकों के नेता शामिल हुए और अब
रूस और चीन के कॉर्पोरेट शासक हलकों के नेता भी उसका हिस्सा बन गए हैं. वे उसे
दुनिया के मानवीय और भौतिक-पर्यावरणीय स्रोतों पर अपनी मजबूत पकड़ बनाने और इस तरह
अपने वित्त एवं धन-दौलत में तेजी से इजाफा करने के लिए इस्तेमाल करते आ रहे हैं.
इसलिए ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की अपनी नीति के तहत
मौजूदा कॉर्पोरेट पूंजीवादी व्यवस्था प्राकृतिक यानी पर्यावरण संबंधी सभी संसाधनों
के दुरुपयोग और अति उपयोग को बढ़ावा देती आ रही है. नतीजा यह है कि ऐसे संसाधन तेजी
से घट रहे हैं. यही नहीं, गैर-बराबरी,
गरीबी, किल्लत वगैरह जैसी
सामाजिक खराबियों की वजह से मानव संसाधन भी मानसिक और शारीरिक दोनों तरह की कमजोरी
का शिकार हो रहे हैं. ऐसी व्यवस्था के चलते पर्यावरण और मनुष्य के लिए बेमिसाल
संकट पैदा हो गया है.
ऐसी अंतरनिर्भर दुनिया में एक देश की सुरक्षा अब अपने
पड़ोसियों की आर्थिक तरक्की और वहां लोकतंत्र के हो रहे विस्तार से जुड़ गई है.
अंतरनिर्भरता का तकाजा है कि वे मनुष्य-मनुष्य के बीच सभी तरह के टकरावों को बंद
कर दें ताकि पर्यावरण और मनुष्य के सामने खड़े बेमिसाल संकट की जानलेवा चुनौतियों
का एक होकर मुकाबला कर सकें.
कॉर्पोरेट पूंजीवादी शासक खुद इस हकीकत से परिचित हैं.
लेकिन वे यह पक्का करना चाहते हैं कि कॉर्पोरेट मुनाफे की उनकी प्रक्रिया कहीं बंद
न हो जाए. जब तक यह प्रक्रिया बंद नहीं होती, वे अमूमन सैनिक जोखिम का
रास्ता नहीं अपनाते क्योंकि अंतरनिर्भर दुनिया में ऐसा करना तर्कसंगत नहीं रहा है.
बहरहाल, कॉर्पोरेट पूंजीपति हमेशा एक ही गुट या खेमे में रहकर काम
नहीं करते. विश्व कॉर्पोरेट पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत काम करते हुए वे
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पैमाने पर अपने-अपने हितों के अनुसार एक से अधिक
समूहों में काम करते हैं.
राष्ट्रीय स्तर पर, जहां उनमें उसी विश्व
व्यवस्था के अंदर काम करने को लेकर बहुत हद तक सहमति होती है, वहीं अपने-अपने हितों को लेकर उनके अंदर टकराव भी होते हैं. इन टकरावों की झलक
राष्ट्रीय स्तर पर उनकी प्रतिनिधि राजनैतिक पार्टियों के बीच टकरावों से मिलती है.
इनमें से कुछ पार्टियां अंतरराष्ट्रीय धारा के तहत काम करते रहने के बावजूद अपने
लोगों के वोट हासिल करने के लिए उनकी राष्ट्रीय भावनाओं का दोहन करती हैं.
आज इसी वजह से कुछ देशों में तथाकथित राष्ट्रीय उभार देखने
को मिल रहा है. इसकी मिसाल हर देश में अलग-अलग तरह से देखी जा सकती है. जैसे भारत
में इस समय हिंदू राष्ट्रवाद का घटनाक्रम देखने को मिल रहा है.
इसी तरह,
कॉर्पोरेट पूंजीपतियों की प्रतिनिधि कुछ दूसरी राजनैतिक
पार्टियां किसी सामाजिक गुट, समुदाय या समूह की समर्थक बनकर या कोई लोक-लुभावन नारा देकर
जनता के वोट बटोरने की कोशिश करती हैं.
ऐसा लग सकता है कि तथाकथित राष्ट्रीय उभार वाले देशों ने
वैश्विक राह पर चलते हुए पीछे की ओर मोड़ काट लिया है, लेकिन कॉर्पोरेट पूंजीपतियों के संबंधित गुट या समूह शायद वैश्वीकरण की इस
प्रक्रिया का उल्लंघन करने के समर्थ न हो सकें जिसने दुनिया को मानसिक और भौतिक
दोनों तरह से वस्तुतः एक इकाई में बदल दिया है और देशों को अंतरनिर्भर बना दिया
है.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, कॉर्पोरेट पूंजीपति गुटों
में से एक या कुछ गुट महाशक्ति या महाशक्तियों अथवा उनके एक या दो समूहों में
विकसित हो जाते हैं. इस तरह, दुनिया भर के
बाजारों, कच्चे माल और सस्ती मेहनत को अपने कंट्रोल में लाने के लिए
होड़ करने के दौरान वे उस महाशक्ति या उनके किसी समूह
के साथ टकराव में आ जाते हैं.
फिर हुई बहुध्रुवीय
दुनिया
पिछले कुछ साल से दुनिया उसी दिशा में बढ़ चुकी दिखती है.
संकट में फंसे अमेरिकी कॉर्पोरेट पूंजीपतियों की ढीली होती गई पकड़ की वजह से
एकध्रुवीय दुनिया धीरे-धीरे फिर से बहुध्रुवीय दुनिया में बदल गई है. और कॉर्पोरेट
पूंजीपतियों के दो खेमे उभर आए हैं. एक का नेतृत्व अमेरिका का शासक गुट कर रहा है, तो दूसरे की रहनुमाई चीन-रूस के शासक गुटों के हाथों में है. दुनिया में
ताकतों के नए पैदा हुए संतुलन पर जरा नजर डालें.
अभी भी हर लिहाज से अव्वल सुपरपॉवर माना गया अमेरिका अपने
खेमे के दूसरे कॉर्पोरेट पूंजीपति गुटों के साथ मिलकर एक तरफ तो दूसरे नंबर की
आर्थिक सुपरपॉवर बने चीन को संसार में कोई कारगर राजनैतिक भूमिका निभाने से रोकने
की और उसे घेरने की हर मुमकिन कोशिश कर रहा है, और दूसरी तरफ एक अन्य
ऐटमी ताकत रूस के खिलाफ पहले तो क्रीमिया और सीरिया में उसकी विस्तारवादी भूमिका
और अब यूक्रेन पर सीधे हमले के कारण एक के बाद एक आर्थिक प्रतिबंध लागू किए जा रहा
है.
अमेरिका के साथ ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान वगैरह उसके परंपरागत दोस्त हैं, तो चीन और रूस छोटे देशों के साथ अपने कूटनीतिक और फौजी रिश्ते मजबूत करने के
अलावा एक-दूसरे से सहयोग कर रहे हैं. दुनिया में आज इन दोनों खेमों की आर्थिक तौर
पर देखें तो हालत खस्ता होती जा रही है. दोनों ही दुनिया भर के बाजारों, कच्चे माल और सस्ती मेहनत को अपने कंट्रोल में लाने के लिए होड़ कर रहे हैं
ताकि अपनी-अपनी गिरती हुई अर्थव्यवस्था को संभाल सकें.
दोनों के पास जबर्दस्त हथियार हैं - ऐटम बम, हाइड्रोजन बम और न जाने क्या-क्या. इसके बावजूद खुद दोनों खेमे सीधा फौजी खतरा उठाने की हिम्मत शायद ही करें. वजह स्पष्ट हैः उन्हें पता है, उन हथियारों के इस्तेमाल से उनका अपना वजूद भी खत्म हो सकता है. और यही नहीं. आज की दुनिया में चूंकि व्यापार, पूंजी निवेश और टेक्नोलॉजी लेने-देने संबंधी कॉर्पोरेट पूंजीवादी प्रक्रियाओं का स्वरूप विश्व स्तर का हो गया है और इसकी वजह से दोनों खेमों ने एक-दूसरे की अर्थव्यवस्था में बहुत ज्यादा निवेश कर रखा है, इसलिए वे उसे खतरे में नहीं डालेंगे. लेकिन दुनिया के हर इलाके में जहां-जहां भी तनाव मौजूद है, वे अपने-अपने दोस्तों के जरिये सीमित ही सही, परोक्ष युद्ध (Proxy war) तो कर ही सकते हैं, या फिर छोटे देशों को धमकी दे सकते हैं.


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