Thursday, June 22, 2023

मोदी की अमेरिका यात्रा: किस का क्या स्वार्थ?

  चित्र साभार: https://thefederal.com/

कॉर्पोरेट पूंजीवादी व्यवस्था वाली आज की मुख्यतः बहुध्रुवीय और दो खेमों में बंटी हुई दुनिया में कोई महाशक्ति हो या दूसरे दर्जे की शक्ति, वह जो कदम उठाती है उसमें उसका कोई न कोई स्वार्थ रहता है. ऐसे में, हर लिहाज से अव्वल सुपर पॉवर माने जाते अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अपने कार्यकाल की तीन-चौथाई अवधि बीत जाने के बाद जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सरकारी राजकीय यात्रा के लिए आमंत्रित किया तो यह सवाल उठना लाजिमी था कि इसमें दोनों के क्या स्वार्थ हैं.  

बतौर प्रधानमंत्री मोदी की अभी तक की इस आठवीं अमेरिका यात्रा में अमेरिकी प्रशासन ने जिस तरह का धूमधाम वाला और आडंबरपूर्ण इंतजाम किया है, वह स्पष्ट संकेत है कि उसकी नजर में दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला भारत किसी धुरे के उस कील के रूप में काम कर सकता है, जिसे महाशक्तियों में दूसरे खेमे के नेता बने चीन के विरुद्ध मैदान में उतारने की संभावना है. उधर, मोदी के लिए किसी अंतरराष्ट्रीय मंच को लपक लेने का यह ऐसा अवसर है, जिसे स्वदेश में कड़ी होती जा रही चुनावी राजनैतिक टक्कर में हिंदुत्व की चाशनी में भिगोकर परोसा जा सकता है और इस तरह वोट बटोरे जा सकते हैं.

पिछले दो दशक से अधिक की अवधि में अमेरिकी प्रशासन भारत को अपना एक बड़ा भागीदार समझता रहा है. यहां तक कि बिल क्लिंटन से लेकर जॉर्ज बुश, बराक ओबामा और डोनल्ड ट्रंप तक अमेरिका के कई राष्ट्रपति भारत का दौरा कर उसे सीधे अपने खेमे में लाने की कोशिशें कर चुके हैं. ट्रंप के साथ तो मोदी के बहुत करीबी संबंध रहे हैं. क्रमशः दोनों देशों में "हौदी, मोदी" और "नमस्ते ट्रंप" नाम की रैलियां तो आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं. यह बात दीगर है कि भारत के कॉर्पोरेट पूंजीपति वर्ग के रूस के साथ करीबी संबंधों के चलते वह किसी खेमे में सीधे प्रवेश से कतराता आया है. 

इसीलिए उक्त किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत के प्रधानमंत्री को वह उत्कृष्ट दर्जा प्रदान नहीं किया, जिससे बाइडन अब मोदी को नवाज रहे हैं. दो दिन की सरकारी राजकीय यात्रा में व्हाइट हाउस मोदी के सम्मान और मेहमाननवाजी में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है. इसमें आगमन और विदाई समारोहों में पूर्ण गार्ड ऑफ ऑनर की प्रस्तुति के अलावा अमेरिका के राष्ट्रपति भवन के सामने स्थित ब्लेयर हाउस नामक सरकारी गेस्ट हाउस में भव्य रात्रिभोज से स्वागत और वहां ठहरने की व्यवस्था, और अमेरिकी संसद में मोदी का संबोधन शामिल है.

अभी तक बाइडन ने व्हाइट हॉउस की राजकीय यात्रा के लिए इस तरह के सर्वोच्च पद वाले और अति प्रतिष्ठित दो ही लोगों को आमंत्रित किया था. इनमें एक फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन और दूसरे दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति यून सुक-योल हैं. दोनों ही अमेरिकी खेमे के देश हैं, जिनके साथ उसकी सुरक्षा संधियां हैं.

आखिर, सम्मान और मेहमाननवाजी की ऐसी बरसात क्यों? जिस अमेरिकी सरकार ने 2005 में मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री रहते उन पर कथित मुस्लिम विरोधी हिंसा का आरोप होने के चलते उनका पर्यटक वीज़ा रद्द कर दिया था, जो तब उन्हें कूटनीतिक वीज़ा तक देने को तैयार नहीं हुई थी, और जिसने नौ साल बाद 2014 में उनके प्रधानमंत्री बनने पर ही उन्हें कूटनीतिक वीज़ा दिया, वह उन पर इस कदर मेहरबान क्यों हो गई है? जाहिर है, इसमें अमेरिका हर लिहाज से अपने कॉर्पोरेट पूंजीवादी हितों को देख रहा है. रेड कार्पेट यानी लाल कालीन बिछाकर, जिसकी परंपरा सदियों से राजाओं और राजपरिवारों में रही है, मोदी का स्वागत करने के पीछे बाइडेन एक तीर से कई शिकार करते दिखते हैं.

इनमें चीन की सैनिक ताकत को काटने और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के अलावा दक्षिण एशिया में उसे उलझाए रखने में भारत को भूमिका निभाने के लिए तैयार करना सबसे बड़ा मकसद है. हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के कुछ भागों को मिलाकर बने इस क्षेत्र में क्वाड संगठन के चार देशों - अमेरिका, जापान, भारत और ऑस्ट्रेलिया - समेत छोटे-बड़े 24 देश आते हैं. अमेरिका का मानना है कि पिछले कुछ दशकों में भारत ही अकेला देश है, जिसने चीन से आमने-सामने की लड़ाई लड़ी है. वही अकेला देश है, जो स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) के अनुसार, हथियारों का सबसे ज्यादा आयात करता है, जिसने 2018 से 2022 तक की अवधि में दुनिया के 11 प्रतिशत हथियार खरीदे हैं.

दूसरा मकसद चीन की आर्थिक ताकत की काट के लिए कॉर्पोरेट पूंजीपतियों के माल-उत्पादन के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क में चीन को धीरे-धीरे परे सरकाकर भारत को उसमें प्रमुख भूमिका निभाने के लिए तैयार करना है. पूंजीवादी माल-उत्पादन के लिए जो तीन घटक - पूंजी, सस्ता श्रम और कच्चा माल - चाहिए, उनमें दो घटक तो चीन और भारत के पास इफरात में हैं. तीसरे घटक पूंजी को कॉर्पोरेट कंपनियां लगाने के लिए तैयार बैठी हैं.

इसकी शुरुआत मई 2022 में इनिशिएटिव ऑन क्रिटिकल ऐंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज़ (iCET) को लेकर भारत-अमेरिका के बीच समझौते से हो भी चुकी है. यही नहीं, अमेरिका की कंप्यूटर मेमोरी और कंप्यूटर डाटा स्टोरेज की उत्पादक माइक्रोन टेक्नोलॉजीज़ के साथ भी भारत में एक कारखाना लगाने के लिए कम-से-कम एक अरब डॉलर निवेश करने की बात तय हो गई है. यह रिपोर्ट भी है कि अमेरिकी टेक्नोलॉजी की दिग्गज ऐपल जो 2021 में भारत में 1 प्रतिशत आइफोन बना रही थी, आज 7 प्रतिशत उत्पादन कर रही है, जिसे बढ़ाकर 2025 तक वह 25 प्रतिशत कर देगी.

अमेरिका का तीसरा मकसद चीनी-रूसी खेमे के साथ भारत के जो संबंध विकसित हुए हैं, उनमें पलीता लगाना है. पिछले 50 साल से अधिक समय से रूसी हथियारों पर भारत की बढ़ी निर्भरता से अमेरिका परेशान है और उसे किसी तरह कम करना चाहता है. यूक्रेन पर रूसी हमले के चलते उससे हथियारों का आना भले ही थोड़ा कम हुआ है, पर पिछले साल तक रूस भारत को हथियारों की 45 प्रतिशत आपूर्ति करता रहा है. इसके अलावा, चीनी-रूसी खेमे की अगुआई वाले ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन जैसी सैन्य-आर्थिक सहयोग का प्रत्यक्ष उद्देश्य रखने वाली संस्थाओं में भारत की मौजूदगी भी उसके लिए कम चिंताजनक नहीं है.

चौथा मकसद मुख्य रूप से सुरक्षा संबंधी अपना सामान और टेक्नोलॉजी भारत को बेचना है. बताया जाता है कि अपने दौरे में मोदी अमेरिकी प्रीडेटर कंपनी के दो दर्जन से अधिक ड्रोन खरीदने के 3 अरब डॉलर के एक सौदे पर दस्तखत करेंगे. रिमोट कंट्रोल से चलने वाले ये सशस्त्र विमान सीमा पर चौकसी के लिए तैनात किए जा सकते हैं. दूसरा सौदा जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी से भारत सरकार की मिल्कियत वाली हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लि. को बंगलुरू के उसके कारखाने में तेजस सैनिक लड़ाकू जेट विमानों के इंजनों का उत्पादन करने के लिए टेक्नोलॉजी देने को लेकर हो सकता है.

पांचवां मकसद अमेरिका में रह रहे भारतीय मूल के मतदाताओं को लुभाना है, जिनकी आज की तारीख में वहां आबादी करीब 50 लाख हो गई है. वे उस देश में मेक्सिको के लोगों के बाद दूसरा सबसे बड़ा अप्रवासी समूह और बहुत तेजी से बढ़ता मतदाता समूह हैं. उसके सदस्य तकनीक, व्यवसाय, बैंकिंग और कानून में प्रभावशाली पदों पर हैं, और कुछ हॉलीवुड में भी प्रसिद्ध चेहरे बन गए हैं. यही नहीं, सत्ता के गलियारों में भी इस समूह का जलवा बढ़ रहा है. एक दशक पहले इसका मात्र 1 अदद सांसद था, लेकिन अब उनकी संख्या बढ़कर 5 हो गई है और कमला हैरिस उपराष्ट्रपति हैं.

उधर, मोदी के लिए यह यात्रा उनके अपने राजनैतिक उद्देश्यों की पूर्ति में सहायक हो सकती है. भारत के अगले आम चुनाव में एक साल से भी कम समय रह गया है, ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से मोदी को पूर्ण सम्मान दिए जाने से घरेलू मतदाताओं पर अच्छा प्रभाव पड़ने की संभावना है. लोगों में यह संदेश जा सकता है कि मोदी ने भारत को विश्व मंच पर एक सम्मानित खिलाड़ी बना दिया है और अब शक्तिशाली पश्चिमी नेता उनका स्वागत करते हैं.

0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home