मार्क्सवाद को भी विज्ञान की कसौटी पर परखना चाहिए
किसी प्रक्रिया के इतिहास को और वह प्रक्रिया कैसे चलती है, इसे बेहतर तरीके से जानने-समझने के लिए इंसान जो सतत प्रयास करता है, उसे ही विज्ञान कहते हैं. और वैज्ञानिक प्रक्रियाएं स्थिर नहीं होतीं, वह निरंतर विकासशील होती हैं.
मार्क्सवाद को भी इसी कसौटी पर परखना चाहिए. उन्नीसवीं सदी के महान विचारक मार्क्स ने मानवीय चिंतन में अनेक नई खोजें की और उसमें उपयोगी योगदान किए. मसलन -- दुनिया में कोई चीज़ निरपेक्ष और शाश्वत नहीं है; हर चीज़ लगातार परिवर्तन में से गुजर रही है; इस संसार और उसकी विभिन्न प्रक्रियाओं को जाना जा सकता है; किसी चीज़ में अंतरविरोध ही उसमें परिवर्तन लाते हैं; अर्थतंत्र सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण कारक है; मानवीय संसाधन (या श्रम) ही पूंजी को पैदा करते हैं; मानव स्वभाव से सामाजिक प्राणी है; वगैरह-वगैरह.
लेकिन सोचने की बात है कि पूंजीवाद से संबंधित मार्क्सवादी सिद्धांत पूंजीवादी देशों मेँ बिल्कुल कामयाब नहीं हो पाया. हां, टेक्नोलॉजिकल रूप से कम विकसित कुछ देशों में इसे जरूर कामयाबी मिली. लेकिन वहां भी जनता को प्रेरित करने में इसकी बजाए उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रवाद और पुराने किस्म के समतावादी सिद्धांत की भूमिका ज्यादा थी. उन देशों में भी क्रांति के बाद जो व्यवस्थाएं बनी, कुछ समय बाद वापस पूंजीवाद के आगोश में समा गईं.
मार्क्सवाद के पॉज़िटिव और नेगेटिव दोनों पहलुओं का मूल्यांकन किया जाना चाहिए. तभी सामाजिक विज्ञान को आगे बढ़ने में मदद मिल सकती है.
किसी प्रक्रिया के इतिहास को और वह प्रक्रिया कैसे चलती है, इसे बेहतर तरीके से जानने-समझने के लिए इंसान जो सतत प्रयास करता है, उसे ही विज्ञान कहते हैं. और वैज्ञानिक प्रक्रियाएं स्थिर नहीं होतीं, वह निरंतर विकासशील होती हैं.
मार्क्सवाद को भी इसी कसौटी पर परखना चाहिए. उन्नीसवीं सदी के महान विचारक मार्क्स ने मानवीय चिंतन में अनेक नई खोजें की और उसमें उपयोगी योगदान किए. मसलन -- दुनिया में कोई चीज़ निरपेक्ष और शाश्वत नहीं है; हर चीज़ लगातार परिवर्तन में से गुजर रही है; इस संसार और उसकी विभिन्न प्रक्रियाओं को जाना जा सकता है; किसी चीज़ में अंतरविरोध ही उसमें परिवर्तन लाते हैं; अर्थतंत्र सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण कारक है; मानवीय संसाधन (या श्रम) ही पूंजी को पैदा करते हैं; मानव स्वभाव से सामाजिक प्राणी है; वगैरह-वगैरह.
लेकिन सोचने की बात है कि पूंजीवाद से संबंधित मार्क्सवादी सिद्धांत पूंजीवादी देशों मेँ बिल्कुल कामयाब नहीं हो पाया. हां, टेक्नोलॉजिकल रूप से कम विकसित कुछ देशों में इसे जरूर कामयाबी मिली. लेकिन वहां भी जनता को प्रेरित करने में इसकी बजाए उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रवाद और पुराने किस्म के समतावादी सिद्धांत की भूमिका ज्यादा थी. उन देशों में भी क्रांति के बाद जो व्यवस्थाएं बनी, कुछ समय बाद वापस पूंजीवाद के आगोश में समा गईं.
मार्क्सवाद के पॉज़िटिव और नेगेटिव दोनों पहलुओं का मूल्यांकन किया जाना चाहिए. तभी सामाजिक विज्ञान को आगे बढ़ने में मदद मिल सकती है.

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