Saturday, October 8, 2016

अ ट्रेजिक फिल्म अ डे, कीप्स अ डॉक्टर अवे




अंग्रेजी का मुहावरा है, ‘‘ऐन ऐपल अ डे, कीप्स अ डॉक्टर अवे.’’ इसी की तर्ज पर अब कहा जा सकता है कि ‘‘अ ट्रेजिक फिल्म अ डे, कीप्स अ डॉक्टर अवे.’’
कई तरह के तजुर्बे करने के बाद शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि दुखांत फिल्में देखने से प्राकृतिक दर्द निवारक रसायन पैदा होता है और इससे आदमी दूसरों के साथ जुड़ता है. यह शोध ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में हुए. शोधकर्ता मानते हैं कि दुखांत दृश्यों से आदमी के अंदर बड़ी मात्रा में एंडॉरफिन नामक रसायन रिलीज़ होता है, जिससे उसे ‘फील गुड’ का एहसास होता है.
दुखांत किस्से-कहानियां, फिल्में या नाटक आदमी में खुशी लाते हैं. यह नई बात है. अभी तक यही समझा जाता रहा है कि केवल हास्य रस की कहानियां, फिल्में या नाटक ही आदमी में एंडॉरफिन पैदा करके खुशी का एहसास बनाते हैं. ऑक्सफोर्ड में इवोल्यूशनरी साइकोलॉजी के प्रोफेसर और इस शोध के अगुआ रॉबिन डनबार ने गत पखवाड़े इस शोध के नतीजे जारी ‍किए.
उनका कहना था, ‘‘नतीजे बताते हैं कि भावात्मक किस्से-कहानियों में हमारी दिलचस्पी शायद इसलिए होती है कि सामाजिक समूहों पर इसका पॉजिटिव असर होता है और इससे हमारे शरीर में एंडॉरफिन का स्तर भी बढ़ जाता है.’’ वैसे, उनका मानना है कि भावात्मक किस्से-कहानियों में हमें आनंद आने की वजह अकेला यही रासायनिक प्रभाव नहीं है बल्कि मानव मनोविज्ञान के दूसरे पहलू भी इसमें काम करते हैं. हां, यह महत्वपूर्ण वजह जरूर है.
अपने प्रयोगों में शोधकर्ताअों ने वालंटियरों के एक समूह को फिल्म ‘‘स्टुअर्ट: अ लाइफ बैकवर्ड्स’’ दिखाई जिसमें त्रासदीपूर्ण बचपन से गुजरे एक बेघर-बार शराबी की कहानी है, जो अंत में आत्महत्या कर लेता है. दूसरे समूह को ऐसे विषयों पर डाक्युमेंटरी फिल्में दिखाई गईं जिनमें भावनात्मक पुट बहुत कम था.
फिल्में देखने से पहले और बाद में इन वालंटियरों में एंडॉरफिन का स्तर नापा गया. पाया गया कि जिन लोगों ने फिल्म के प्रति सबसे ज्यादा भावात्मक प्रतिक्रिया दिखाई थी, उनमें पीड़ा सहने की क्षमता सबसे ज्यादा पाई गई और अपने समूह से भी उनका जुड़ाव बढ़ा.
इससे शायद इस बात का जवाब मिल जाए कि अनंत काल से लोक कथाएं क्यों मनुष्य को आकर्षित करती आ रही हैं और वह उन्हीं को क्यों बार-बार दोहराता रहता है.
Pic: ‘‘स्टुअर्ट: अ लाइफ बैकवर्ड्स’’ के एक दृश्य में टॉम हार्डी

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